एक लम्हा मेरा खो गया,

एक लम्हा थी जो झिन्दगी

एक लम्हा सब रूक जाता तो…

वो होता था जो हुआ नहि? 

कल सावन बरसा रेत पर,

थी पल भर भीनी रोशनी,

फिर अंधेरे ने कह दिया…

या तू नहि या मैं नहि

कुछ अपनों से प्यार था,

रिश्तों का व्यापार था

जंग छीडी़ उन दोनो में…

जो जीती तो भी क्या जीती?

ईन्सां हूं मैं उसका हूं,

मांस का बना मूर्दा हूं

पर झिन्दा जिसने छोडा़ वो…

क्या जाने ये झिन्दगी?

- संजय वि. शाह ‘शर्मिल’

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