रणकार
भारतीय ईन्सान कैसे है? पचास लाख रूपये की पॉश कार में घूमे-फिरे फिर भी जब उस में से उतरेंगे तब बडी़ जो़र से, पटक के उसका दरवाजा़ बंद करेंगे वैसे. या फिर प्रति स्क्वॅअर फूट २२,००० के घर में रहेंगे फिर भी घर की बालकनी में तरह तरह के कपडो़ के साथ सफाई के फट्टे भी सूखाने को टांग ही देंगे वैसे. या फिर कहिए कि मल्टिप्लॅक्स में सांठ रूपये का पॉपकॉर्न का पॅकेट बिना आपत्ति खरीदेंगे लेकिन किसी फेरीवाले से दस रूपये के चना लेते वक्त अवश्य उसके साथ भावताल भी करेंगे और भेजाफॉडी भी करेंगे वैसे. कुछ कुछ बाते जैसे प्रकॄति का हिस्सा हिस्सा ही बन गई है हमारे देश की प्रजा के लिए. संस्कारी, समज़दार और सौजन्यशील भी है हम. सिस्टमॅटिक, संतुलित और शिस्त के आग्रही नहि है हम लोग. कभी भी, किसी के भी साथ हम कुछ भी कर बैठे ऐसे भी है. दिखावे के लिए समयपत्रक हम रखते है लेकिन समय के अनुसार कभी भी नहि चलेंगे. फिर ईस देश का होगा तो क्या होगा? प्रगति के पंथ पर सिर्फ ईस देश की नहि, हर ईन्सान की नीजी गाडी़ उस गति से नहि चल पाती जिस गति से चलनी चाहिए. चाहे हम बंजारा हिल्स में हो या बंगाल में, गंदगी, अराजकता और दिक्कतें हमारा पीछा छोडती ही नहि. ईसी मूलभूत स्वभाव के कारण ही ना हम ईस बात का गर्व कर सकते है और ना ही हमारा देश वैसी प्रगति कर पा रहा है जिसे देखकर दुनिया भारत का द्रष्टांत देने लगे. ये सब पढ़कर लेकिन परेशान ना होईए. छोटी छोटी बातों में द्रढ मनोबल रखकर, सुनिश्चित रहकर अगर हम परिवर्तन करना चाहेंगे तो हम बहूत आगे जा सकते है. बिगड़ना या बिगाड़ना संगत से हो जात है पर सुधरना-सुधारने का कार्य तो हर ईन्सान को अपने आप ही करना पड़ता है.आप खुद अपने लिए ईस बात पर सच्चे मन से अमल किजिए, फिर देखिए, आपका भी भला हो जाएगा और देश का भी.
- संजय वि. शाह ‘शर्मिल’

