संजय वि. शाह

मतलब, दुनिया के सातोसात दरिया की कसम खा के पूछता हूं, ये ब्ल्यु बनाकर एन्थनी डिसोजा़ आखिर क्या साबित करना चाहते होंगे? यही कि भारतीय दर्शकों को दरिये के नीचे के द्रश्य दिखाओ तो वो खुश हो जाते है? वो भी एक लंबी-चौडी़ फिल्म में सिर्फ पांच (या सात, आठ

BLUE movie still

BLUE movie still

, नौ… जो भी हो) मिनट ही के लिये? गुजराती निर्माता धीलीन महेता की १२० करोड़ की दिवाली गिफ्ट सचमुच महंगी है. ईसे देखने के लिये पहले पैसे खर्च करने के बाद समय भी खर्च करना पडता है. और बदले में मिलता है क्या?

बहामा में रहते सागर (संजय दत्त) और आरव (अक्षय कुमार) दोस्त है. मतलब, ऐस थोडा़ थोडा़ लगते रहता है. आरव बहूत अमीर है और सागर की  हालत साधारण है. सागर का भाई समीर उर्फ सॅम (जा़येद खान) बेंगकोक में गुलशन (राहुल देव) नाम के एक माफिया के  एक खेल में फंस जाता है. जान बचाने के लिये वो वहां से भाग चला आता है अपने भाई के पास. यहां आरव लंबे अरसे से सागर के पीछे पडा़ हुआ है कि बरसों पहले सागर में डूबे, खजा़ने से लदे जहाज लॅडी ईन ब्ल्यु को चल मेरे यार, ढूंढ निकालते है. ज़रा पूछे तो, आरव क्यूं सागर ही के  पीछे पडा़ है? समज़ भी जाओ यार, सागर से अच्छी तरह सागर को समज़ने वाल कोई भी बहामा में नहि है. सागर लेकिन ये सदकार्य करने की ना करते जाता है. ना करते ही जाता है और तभी, सिनेमा हॉल की सिलिंग की लाईटस ऑन हो जाती है. ईन्टरवल, थॅन्क गॉड.

सॅम के आने के बाद संजोग बदल जाते है और सागर मान जाता है. यहां तक, बोलो तो, फिल्म में सबसे अच्छा क्या था? बहामा का सौंदर्य, बहामा के लॉकाल्स. यहां से आगे कहो तो फिल्म में क्या अच्छा है? वो पांच मिनटे जिनकी बात शुरूआत में कर दी. ऑके? कहानी की कहानी खत्म. बाकी की बातें करे?

ब्ल्यु भले ही बॉकस ऑफिस पर, थॅन्क्स टु ऑवर पब्लिसिटी, ऑवर क्युरिऑसिटी, फॅस्टिविटी, अच्छा स्टार्ट ले गई, पर उसका भविष्य बहूत अच्छा नहि है. ब्ल्यु में क्या क्या खामीयां है उसकी बात करने से पहले दो-चार शब्द उसकी प्रशस्ति के कहने ही रहे. ईस फिल्म से बॉलिवुड ने कुछ हद तक ये साबित कर दिया है कि बडे पैसे खर्च कर के, काबिल टॅक्निशियन्स को लेकर, वो भी, हॉलिवुड की तरह हाईक्लास प्रॉडक्शन के लिये सज्ज हो रहा है. अब सवाल रहता है अच्छी स्क्रिप्ट का. बेंगकोक में शूट किए गये बाईक रॅसिंग के द्रश्य, अंडरवॉटर द्रश्य ईस फिल्म  के प्लस पॉईन्टस है. ये द्रश्य कभी, किसी हाल में फिल्म नहि बनते है ये और बात है.

ब्ल्यु की खामीयां… आ आ आ.. ये क्या बात शुरू कर दी! लक्ष्मण उत्तेकर की सिनेमेटॉग्राफी उमदा है. बहामा को उन्होने काफी सुंदरता से कॅमेरा में  कैद किया है. श्याम सालगांवकर (सॅली)  के हिस्से में एडिटिंग टॅबल पर कुछ खास काम नहि आया होगा. कारण, द्रश्यो में या पटकथा में प्रवाह जैसा कुछ नहि है. ढेर सारे गीतकार, उतने ही नॄत्यकार मिलकर भी एक भी गीत को परदे पर चकाचक  नहि बना पाए है. और हे भगवान, ये ए. आर. रहमान ने संगीत में क्या कबाडा किया! ब्ल्यु सच में तो बिना गीत की फिल्म होती तो ज्यादा अच्छा होता.  फिल्म की लंबाई उतनी कम हो जाती, यु सी! कायली मिनोग के पास काय करने को वास्ते चिगी विगी करवाया ये भी अगर कोई बताएगा तो शुक्रगुजार रहेंगे.  रहमान के बॅकग्राउन्ड म्युजि़क से एक्शन के द्रश्यों में ज्यादा दम महसूस होता है ये लेकिन मानना पडेगा. आर. पी. यादव और जॅम्स बॉमालिक की एक्शन सह्य है, देख सकते है. अंडरवॉटर कॅमेरामेन पीट जुकेरीनी के  कमाल काम का सर्जक बहोत ज्यादा फायदा उठा सकते थे. उनका काम सराहनीय है. कहानी और पटकथा के बारे में कहने जैसा कुछ भी नहि है. मयूर पुरी के संवाद एकदम एवरेज है. संजुबाबा और अक्षय कुमार एक दूसरे को सरकार और सेठजी क्यूं कहते है क्या पता. ये फिल्म पहले बहामा के बदले बिलासपुर में शूट होने वाली थी?

पूरी फिल्म में संजय दत्त थका थका सा और नीरस लगता है. अक्षय कुमार ने एक्टिंग की है या खुद को शाहरुख खान मानकर अपने वही पुराने नखरे-झटके दिखाए है? प्लीज, दर्शकों को ऐसे मूर्ख ना बना, अक्षय. जायेद खान दो बडे स्टार्स के बिच में सॅन्डविच हो गया है. राहुल देव ऑके है. लारा दत्ता  का उल्लेख सीधे यहां, अभिनय की समीक्षा में हो रहा है उसका एक ही अर्थ है: उसके हिस्से में टु-पीस पहनकर सॅक्सी दिखने के अलावा कुछ भी  नहि आया है. गॅस्ट अपीअरन्स में कॅटरिना कैफ है ये बात सिर्फ उसके चाहको के लिये खुश होने वाली है. कबीर बेदी ने ऐसा किरदार क्यूं लिया और निभाया वो समज में नहि आ रहा.

श्री अष्टविनायक सिनेविजन ने ब्ल्यु जैसी, बॉलिवुड जो फटाफट सोचे नहि और सोचे तो जिसके पीछे पैसा लगाने से पहले हजार बार सोचे वैसी महंगी फिल्म का निर्माण करके बेशक, एक नयी दिशा दिखाने की कोशिश की  है.  ये अलग बात है कि उसका आशय, बिझनेस-वाईज सफल जुगार साबित हो गया तो भी क्वॉलिटी-वाईज वो यादगार नहि बनेगा. एन्थनी डिसोजा को या तो उनका ऑवर कॉन्फिडन्स या उनका कम अनुभव नडा है. परिणाम स्वरूप, ब्ल्यु देखते देखते बीच दरिया में फंस गए ऐसा महसूस करके खुद से ही पूछना पडता है: आखिर क्यूं?

रॅटिग: * *

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