रणकार

कैसा विरोधाभास प्रवर्तमान है ईस जगत में! कम्प्युटर के लिये जो चाहिए वो सीडी़ की कीमत सिर्फ दस रूपये. रॅस्टॉरां में जो मिलता है वो ज्युस का एक ग्लास चालीस रूपये का! महंगाई ने टॅक्नॉलोजी को बेहद सस्ता कर दिया है और एक वक्त के खाने को आश्चर्यचकित कर दे उतना महंगा. आम आदमी की हालत ईस विरोधाभास ने बहूत ही विकट कर डा़ली है. फिर भी सब को जीवन जीना तो पडे़गा ही और गाडी़ आगे भी ले जानी पडे़गी. हां, ईस काम को अच्छी तरह करने के लिए ज़रा सी समज़दारी दिखाना भी महत्त्वपूर्ण है. उदाहरण के तौर पर, अगर हमारा अखबार उसके दाम में सिर्फ आठ आना- एक रूपया बढा़ देता है तो हम चिल्लाने लगते है. लेकिन उससे एकदम विपरित, घर में डे़ढ सौ रूपये में लिया गया और अच्छे से चल रहा कॅबल कनेक्शन हमे यूं ही बूरा लगने लगता है और हम दिखावे के पीछे, दूसरो को देखकर डी़टीएच सर्विस ले लेते है. ऐसे खुश होकर कि मानो कॅबल कनेक्शन में तो कभी कोई चॅनल दिखता ही नहि था! लक्झरी, फॅसिलिटी और स्टाईल के नाम पर लोग न जाने कितना रूपया खर्च कर बैठते है. दूर की सोचे बिना ही. दिखावे के लिये लोग बीस-पच्चीस हजा़र का मॉबाईल हॅन्डसॅट चुटकी बजाकर खरीद लेते है, लेकिन घर पर अगर संतान दो-पांचसौ रूपये का खिलौना मांगेगा तो लोगो को गुस्सा आ जाता है. उस महंगे मॉबाईल में जो फॅसिलिटी दी गई है उसमें से सचमुच में कितनी काम आती है वो तो भगवान ही जाने. ऐसे ही कितकितने विरोधाभास समाज के हर पहलू में, हर वर्ग में और हर कार्य में फैल चूके है. जीवन में भी. ईन विरोधाभास से कभी छूटकारा पाओ, समज़दारी बरतो तो यह पता चलेगा कि महंगाई के ईस कठीन युग में भी हमारी जेब में लडने की बहूत ताकत है. समय बेशक कठीन है लेकिन कुछ नासमजी़ से अलिप्त रहे, संयम रखे तो ईस समय का सामना करना आसान हो जाएगा. एक दिन सुबह से लेकर रात तक सोचना ईस छोटी सी बात पर. शायद खुद की ही गलतीओं पर हंसना आएगा और उन्हे सुधारने का द्रढ मनोबल भी उसी से प्राप्त होगा.

- संजय वि. शाह ‘शर्मिल’

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