Hindi Poems

मां सच्ची या सच्चा मैं हूं?

मेरी मां ने कहा था बेटे छोटा है तूं रोज़ ये बाता सोच सोच मैं खुद से पुछूं… मां सच्ची या सच्चा मैं हूं? पहले तो ये जाना भी ना मैया है क्या चिल्लाती भी ईतराती ये औरत है क्या खाना भी देती थी फिर भी गुस्सा करती और अकेले जा के रोती करती है क्या? रिश्ता रस्ता...

छेडो़ न कान मोहे

(कॄष्णपर्व नाटक का गीत) छेडो़ न कान मोहे नटख़ट गोपाल तोहे बंसी की सों तोहे बंसी की सों गोरी दीवानी मोरी राधा रंगीली थोरी सुनियो मोरी ना दीजो बंसी की सों मोहे बंसी की सों… आवे तूं पास जावे दे दई के प्यास करे नैनन ऊदास मोरे नैनन ऊदास फिर जा के मिल जावे गोपीओं के साथ नाहि सोचे...

मां

सोचो ये दुनिया क्या होती अगर भगवान के जैसी मां न होती? उसके हाथों की लकीरें जिम्मेदारीओं का बोज़ ढहकर न जाने कब मिट जाती है पर ऐसा करते करते वो संतान के हाथों की लकीरों को सुख्-समॄद्धि से भर देती है… अपनी जवानी खोकर मां हमको बचपन देती है खुद बुढी हो जाती है...

प्रार्थना सिद्दिविनायक की…

पाप छूटे और चिंता छूटे, मन में सच्ची करुणा उमटे जीवन को नयी दिशा मिले, जब तेरे दर्शन करते है… चलो सिद्धिविनायक चलते है बाप्पा के दर्शन करते है… सिद्धिविनायक, सिद्धिविनायक, सिद्धिविनायक देवा करूं करूं मैं करूं करूं मैं हर दम तेरी सेवा… (२) साफ़ करो दिल माथा टेको गणराया की आंखे़ देखो दादर में...

झिन्दगी…

  एक लम्हा मेरा खो गया, एक लम्हा थी जो झिन्दगी एक लम्हा सब रूक जाता तो… वो होता था जो हुआ नहि?  कल सावन बरसा रेत पर, थी पल भर भीनी रोशनी, फिर अंधेरे ने कह दिया… या तू नहि या मैं नहि कुछ अपनों से प्यार था, रिश्तों का व्यापार था जंग छीडी़...

Chitika!

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