हिन्दी रणकार
चाहे समज में आये या ना आये, और अगर याद रहे या ना रहे, छोटे बच्चों को हर नयी फिल्म का हर नया गाना याद रह ही जाता है. भले फिर उन्हे ये गीत कुछ ही समय और कुछ ही दिन के लिये याद रहे, या अच्छे लगे. हॅमरिंग यानि कि बार बार एक ही चीज़ दिखा-बता कर लोगो के सर पर मारने का ज़माना है यह. ऍडवर्टाईजमॅन्ट टॅलिविज़न प्रमॉशन, बिनज़रूरी दिखावा कर के ईस ज़माने में कोई भी आदमी और कोई भी चीज़ लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित कर सकता है. ईसके लिये अच्छे गुण या कोई विशिष्ट खासियत होने की भी आवश्यकता नहि. प्रचार, दिखावा ईत्यादी की असर बच्चों के मन पर बेहद ज्यादा होती है ये बात भी माननी ही पडेगी. चाहे वो फिल्मी गाने हो, खानेपीने के फॅन्सी पदार्थ हो, टॉईलेटरीज़ हो, ईलॅक्ट्रॉनिक उपकरण हो… कुछ भी हो, सब कुछ बेचने के लिये मानो बच्चों को ही लक्ष्य बनाने का दौर चल रहा है. ईसके कारण दो आपत्ति आ पडी है: एक तो ये कि बच्चों को समजाए कैसे कि सचमुच क्या काम का है और क्या बेकार है, और दूसरी ये कि बच्चें नहि माने तो किसीने की हुई पब्लिसिटी के लिये आम आदमी को जो फिजुल खर्च करना पडता है उसे टाले तो कैसे टाले? फिर भी जरा सोचिए: ईसमें अगर दोष है तो किसका है? बुजुर्गों का ही तो. बच्चें तो निर्दोष होते है. बच्चें त्तो किसीका भी कहा मान लेंगे और हो सकता है कि किसीका भी कहा ना माने. लेकिन बच्चों को सही-गलत की सच्ची शिक्षा देने का, उनके मन को समजकर उनका मन साफ-सच्चा और तेज़ बनाने का काम करने का समय कितने बुजुर्गों के पास है? अगर बुजुर्ग बच्चों को भले-बूरे का फर्क समजाने के लिये समय ना निकाले तो ये बेहद ही स्वाभाविक हो जाता है कि बचच्चों को टॅलिविजन पर, फिल्मो में जो दिखाया जाएगा वो सच्चा ही लगेगा. और तो और, गुस्सा करने के बाद, डराने-धमकाने के बाद अगर बुजुर्ग बच्चों को कुछ रूपये देकर मनचाही चीज खरीदने की छूट दे दे, ये सोचकर कि, “चलो, कुछ रूपयों मे जान तो छूटी…” तो आखिर में बच्चे को तो ऐसा ही लगेगा कि उसके मन की हो गयी. बच्चे को ना बुजुर्ग की सीख याद रहती है, और ना ही याद रहता है उनका गुस्सा. एक बात बुजुर्गों को याद रहे कि निर्दोषता के मीठे वर्षों में मिलने वाली शिक्षा और समजदारी से ही तय होता है कि बच्चे सयाने होकर क्या बनेंगे, कैसे बनेंगे. टॅलिविजन के पांच एडवर्टाईज जितना समय बच्चे को नियमित देकर कोशिश तो करके देखिए कि बच्चे को आप सच्ची शिक्षा दे सकते हो या नहि. उन्हे ये समजा़कर तो देखिए कि अच्छा, सच्चा, उपयोगी और फिजुल क्या है. फिर उन्हे फर्क समज में ना आए ऐसा हो ही नहि सकता. लेकिन उसके लिये पहले बुजुर्गो को समय निकालना पडेगा, तब जाकर…
- संजय वि. शाह
(२८-०९-२००९ के गुजराती रणकार का हिन्दी संस्करण. रणकार मुंबई समचार में पिछले ११ वर्षों से प्रसिद्ध होती सुविचार की लोकप्रिय कटार है)

