रणकार
सचीन तेंडुलकर, राहुल द्रविड, सुनील गावसकर… देश और दुनिया के बडे़ बडे़ क्रिकॅटर्स को लोगो ने शून्य रन बनाकर आउट होते हुए देखा है. कितने चपल, विचारशील, चॅम्पियन और महान कक्षा के होने के बावजुद ईन खिलाडीओं को हमने एक भी रन बनाए बिना आउट होते देखा है. किसीके भी साथ ऐसा हो सकता है, होता भी है. ईन्सान की काबिलियत उसके लिए सुख-समॄद्धि पाने की एक ज़रूरत है. लेकिन उसका उपयोग करते वक्त जो संजोग होते है, जो जरूरतें आन पडती है, उनके सारे पहलु ईन्सान के हाथ में नहि होते. कर सकना, करने के बारे में सोचना और सचमूच कर दिखाना ये तीनो बात अलग है. सचमूच कर दिखाते वक्त कोई भी बात विघ्न का रूप ले सकती है. क्रिकॅटर और आम आदमी में फर्क ईतना ही है कि आम आदमी विफल हो जाता है तो सबसे पहले तो वो खुद ही अपने आपको कोसेगा. फिर उसे कोसेंगे उसके परिवार वाले, और फिर सारी दुनिया भी उसे कोसने में कोई कसर नहि छोडेगी. क्रिकॅटर के साथ ऐसा नहि होता. वो नाकाम हो जाए तो उसे फोर्म दिखाने का, कुछ कर दिखाने का मौका अगमे मॅच में मिल जाता है. अगर वो सफल हो जाए तो उसकी पिछली गलती तो सब रातोरात भूल जाते है. आम आदमी एक बार नाकाम होता है तो उसे सारा जीवन बट्टा लेकर जीना पडता है, बूरी यादें उसका पीछा करते रहती और दुनिया उसे गुजरा हुआ कल याद दिलाकर कोसती रहती है. एक व्यापारी अगर व्यापार में वक्त पर पैसे ना चूका सके तो बरसोप तक बाजार में कहा जाएगा, “उसका व्यवहार साफ नहि है…” और ईस दबाव में, लोगों की गलत मान्यताओं के बोज तले जो दब गया उसका क्या हाल होगा यह तो सिर्फ सोचने की बात है. लेकिन हम सब ईसी समाज के प्रतिनिधि है. और हमे ये समजना पडेगा कि किसी ईन्सान को उसकी एकाद गलती के कारण हमेशा के लिये गलत मान लेना, नाकाम कह देना ये ठीक नहि है. जिस क्रिकॅटर को आप जानते नहि, जिसकी करनी से प्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन पर कोई प्रभाव नहि पडता, उसे सुधरने का, कुछ कर दिखाने का बार बार मौका हम देते है, उस पर बुलंद भरोसा रखते है, तो उन ईन्सानो पर क्यों भरोसा ना रखे जो हमारे आसपास है, हमारे अपने है? किसी पर भरोसा रखकर, उसे प्रोत्साहित करके देखिए तो सही, उस ईन्सान का जीवन भी उजला हो जाएगा और समाज भी.
- संजय वि. शाह

